तुम जो यूँ अपनी जुल्फें संवारती हो | Love Poems

तुम जो यूँ बार-बार अपनी
जुल्फें संवारती हो,
क्यों मुझे अपनी गुस्ताख
नज़रों से मारती हो
♥♥
तुम जानती हो अब हम दो
किनारे किसी दरिया के हैं,
मेरे दिल के जख्म अभी भरे नहीं
है,
क्यों तुम उन्हें छूकर फिर
उभारती हो
♥♥
मेरी किस्मत में अश्क ही
लिखे है शायद,
क्यों मुझे तुम यूँ पुकारती
हो
♥♥


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4 thoughts on “तुम जो यूँ अपनी जुल्फें संवारती हो | Love Poems

  1. खूबसूरत शब्द

  2. Beautiful words 🙂 And I love the new blog look !

    1. THank you so much 🙂

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